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गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

महंगाई हो गई है ?



आवश्यक वस्तुओं की कमर तोड़ महंगाई के इस जमाने में क्या आप 12.50 रुपये में शाकाहारी थाली मिलने की कल्पना कर सकते हैं? संसद भवन की कैंटीन में यह सहज संभव और सुलभ है। इतना सस्ता खाना न केवल संसद सदस्यों, बल्कि संसद के कर्मचारियों, सुरक्षाकर्मियों और मान्यता प्राप्त पत्रकारों को भी उपलब्ध है। यह सस्ता भोजन आम आदमी की गाढ़ी कमाई यानी सरकारी सब्सिडी की देन है। भारी भरकम सब्सिडी के चलते ही संसद की कैंटीनों में दाल, सब्जी, चार चपाती, चावल या पुलाव, दही और सलाद के साथ शाकाहारी थाली की कीमत 12.50 रुपये है। मांसाहारी थाली की कीमत 22 रुपये है। दही चावल केवल 11 रुपये में उपलब्ध है। वेज पुलाव आठ रुपये, चिकन बिरयानी 34 रुपये, फिश करी और चावल 13 रुपये, राजमा चावल सात रुपये, चिकन करी 20.50 रुपये, चिकन मसाला 24.50 रुपये और बटर चिकन 27 रुपये। खीर की कीमत 5.50 रुपये कटोरी, छोटा फ्रूट केक 9.50 रुपये और फ्रूट सलाद की कीमत सात रुपये है। आश्चर्य नहीं कि इसी कारण हमारे सांसदों को इसका अहसास नहीं हो पा रहा है कि बढ़ती महंगाई आम आदमी के लिए कितनी कष्टकारी है? संसद भवन में भोजन इकाइयों का संचालन भारतीय रेलवे के हाथ है। इनमें पुस्तकालय और एनेक्सी में स्थित कैंटीन भी शामिल है। यहां दशकों से कीमतों वैसी हैं। एक अधिकारी ने बताया कि सरकार ने इस वित्तीय वर्ष के लिए संसद की कैंटीनों के लिए 5.3 करोड़ रुपये का आवंटन किया है। इसमें लोकसभा ने करीब 3.55 करोड़ रुपये और राज्यसभा ने 1.77 करोड़ रुपये का भुगतान किया। अधिकारी ने बताया कि अंतिम बार संसद भवन में खाने की कीमतों की समीक्षा वर्ष 2004 में की गई थी। तेलुगू देशम पार्टी के सांसद के.येरन नायडू की अध्यक्षता में वर्ष 2005 में खाने की दरों की समीक्षा के लिए एक संसदीय समिति का गठन किया गया था, लेकिन समिति ने न तो अपनी रिपोर्ट सौंपी और न ही दरों में कोई बदलाव किया गया

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